कभी चुप रहे कर दोस्तों को दर्द मैं दुबोती, तो कभी लाव्जों से दिलों को भिगोती
पलभर की खुशियों पे घुंगरू सी बजती तो छोटी सी बातों पे छुप छुप के रोती
रुकी सांसो मैं आज वो खुशबु आ गई, तो यादों की बुधियाँ पे जवानी छ गई।
अकेले अकेले कुछ सोचते रहना, या भरी महफिल मैं बिना सोचे बोल देना
कभी मोहोबत मैं बहने को तड़पते रहना और गिरते ही प्यार मैं सांसे रोक लेना
कोई कहता की मुस्कुराने की अदा भा गई तो सहेमे से लम्हों पे रुमानियत छा गई।
हर बात को अदा की राहों से छेड़ती मुलाक़ात को जश्न की बांहों मैं भेजती
खुदको अश्क दोस्तों को रुखसार समज्ती कागज़ के परबत पे घटा बन के बरसती
जो नज़र ये लाव्ज़- ऐ- लुत्फ़ मैं बही, तो अचानक मुजे "मैं" याद आ गई।
Wednesday, April 23, 2008
Subscribe to:
Posts (Atom)